उत्तराखंड एसडीआरएफ ने रचा इतिहास, देश में पहली बार किसी आपदा प्रतिवादन बल को मिला आईएसओ सर्टिफिकेट
देहरादून। प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से बेहद संवेदनशील माने जाने वाले देवभूमि उत्तराखंड के राज्य आपदा प्रतिवादन बल (एसडीआरएफ) ने देश भर में एक नया और गौरवशाली इतिहास रच दिया है। उत्तराखंड एसडीआरएफ देश का पहला ऐसा आपदा प्रतिवादन बल बन गया है, जिसे प्रतिष्ठित 'आईएसओ 9001:2015' गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली का प्रमाण-पत्र प्रदान किया गया है। यह उपलब्धि न केवल बल के उच्च अनुशासन और कार्यकुशलता को दर्शाती है, बल्कि यह भी साबित करती है कि यहां का आपदा प्रबंधन बल वैश्विक और राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप पूरी मुस्तैदी से कार्य कर रहा है।
भूकंप हो या भूस्खलन, बादल फटना हो या बाढ़, पहाड़ों में फंसे लोगों को सुरक्षित निकालना हो या दुर्गम रास्तों पर जिंदगी बचाने की चुनौती—उत्तराखंड राज्य आपदा प्रतिवादन बल (एसडीआरएफ) ने अपनी कार्यप्रणाली और गुणवत्ता प्रबंधन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। उत्तराखंड एसडीआरएफ को आईएसओ 9001:2015 गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली का प्रमाण-पत्र प्रदान किया गया है। दावा किया गया है कि इस प्रमाण-पत्र को हासिल करने वाला एसडीआरएफ देश का पहला आपदा प्रतिवादन बल बन गया है। आपदा की दृष्टि से संवेदनशील उत्तराखंड के लिए इसे राहत और बचाव व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह प्रमाण-पत्र बल की प्रशासनिक व्यवस्था, प्रशिक्षण, संसाधन प्रबंधन, दस्तावेजों के रखरखाव और निर्धारित मानक संचालन प्रक्रियाओं के पालन का मूल्यांकन करने के बाद दिया गया। इसका उद्देश्य केवल उपलब्धि दर्ज करना नहीं, बल्कि कामकाज में गुणवत्ता बनाए रखने और लगातार सुधार की व्यवस्था को मजबूत करना भी है। एसडीआरएफ को यह उपलब्धि निर्धारित मानकों पर खरा उतरने के बाद मिली। इसके लिए 23 से 25 सितंबर 2026 तक जौलीग्रांट स्थित एसडीआरएफ वाहिनी मुख्यालय में भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) की ओर से दूसरा परीक्षण किया गया। इस दौरान बीआईएस के पूर्व वैज्ञानिक-जी एवं उपमहानिदेशक विष्णु गुप्ता ने सेनानायक अर्पण यदुवंशी की मौजूदगी में बल की विभिन्न शाखाओं और कार्यप्रणालियों का निरीक्षण किया। परीक्षण के दौरान प्रशासनिक व्यवस्थाओं, जवानों के प्रशिक्षण, संसाधनों के प्रबंधन, अभिलेखों के रखरखाव, गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली और मानक संचालन प्रक्रियाओं के अनुपालन की जांच की गई। इन पहलुओं के मूल्यांकन के बाद 8 अक्टूबर 2026 को एसडीआरएफ उत्तराखंड को आईएसओ 9001:2015 प्रमाण-पत्र प्रदान किया गया। उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां राहत और बचाव कार्यों को चुनौतीपूर्ण बनाती हैं। प्रदेश में भूकंप, भूस्खलन, अतिवृष्टि, बादल फटने, बाढ़, हिमस्खलन और सड़क दुर्घटनाओं जैसी घटनाओं के दौरान तत्काल सहायता पहुंचाना बेहद जरूरी होता है। कई बार दुर्गम पहाड़ी रास्तों, खराब मौसम और सीमित संसाधनों के बीच बचाव अभियान चलाना पड़ता है। ऐसे हालात में एसडीआरएफ की 40 से अधिक टीमें प्रदेशभर में चौबीसों घंटे राहत और बचाव कार्यों के लिए तैयार रहती हैं। नदी-नालों में खोज अभियान, दुर्घटनाओं में घायलों की मदद, दुर्गम इलाकों में फंसे लोगों को सुरक्षित निकालना और आपदा प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचना बल की प्रमुख जिम्मेदारियों में शामिल है। इन अभियानों में जवानों का प्रशिक्षण, उपकरणों की उपलब्धता, संसाधनों का सही इस्तेमाल और समय पर निर्णय लेना निर्णायक भूमिका निभाते हैं। गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली इन व्यवस्थाओं को निर्धारित मानकों के अनुरूप बनाए रखने में मदद कर सकती है। एसडीआरएफ का कार्यक्षेत्र प्राकृतिक आपदाओं तक सीमित नहीं है। चारधाम यात्रा के दौरान दुर्गम पैदल मार्गों पर श्रद्धालुओं की सहायता, ऊंचाई वाले क्षेत्रों में फंसे पर्यटकों और पर्वतारोहियों को सुरक्षित निकालना तथा धार्मिक आयोजनों और साहसिक पर्यटन गतिविधियों के दौरान आपात स्थितियों से निपटना भी बल की जिम्मेदारी है। उत्तराखंड में हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं। रिवर राफ्टिंग, पर्वतारोहण और अन्य साहसिक गतिविधियों के दौरान भी दुर्घटनाओं की आशंका बनी रहती है। ऐसे में प्रशिक्षित जवानों, आधुनिक उपकरणों और विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत होती है। आईएसओ 9001:2015 प्रमाण-पत्र मिलने से एसडीआरएफ की कार्यप्रणाली में जिम्मेदारियों के निर्धारण, अभिलेखों के रखरखाव, उपकरणों की देखभाल, प्रशिक्षण और संसाधनों के प्रबंधन को व्यवस्थित करने में मदद मिलने की उम्मीद है। हालांकि, प्रमाण-पत्र अपने आप में बेहतर बचाव परिणामों की गारंटी नहीं है। इसकी वास्तविक उपयोगिता इस बात से तय होगी कि निर्धारित प्रक्रियाओं का नियमित पालन और समय-समय पर सुधार किस तरह किया जाता है। उत्तराखंड जैसे आपदा-संवेदनशील राज्य में इस उपलब्धि के साथ जनता की अपेक्षाएं भी बढ़ेंगी। चुनौती अब इस गुणवत्ता व्यवस्था को जमीन पर प्रभावी बनाए रखने की है, ताकि संकट की घड़ी में हर जरूरतमंद तक समय पर सहायता पहुंचे और अधिक से अधिक लोगों की जान बचाई जा सके।