पश्चिम एशिया तनाव का असर रसोई तक: रेस्टोरेंट के मेन्यू से गायब डोसा-पूरी, गैस संकट से जूझ रहा हॉस्पिटैलिटी सेक्टर
भारत में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब आम लोगों की थाली तक पहुंचने लगा है। देश के कई बड़े शहरों में कमर्शियल रसोई गैस की आपूर्ति प्रभावित होने से होटल और रेस्टोरेंट अपने मेन्यू में बड़े बदलाव करने को मजबूर हो गए हैं। कई जगहों पर डोसा, पूरी, राजमा और छोले जैसे ज्यादा गैस खपत वाले व्यंजन अस्थायी रूप से बंद कर दिए गए हैं, जबकि कुछ कैंटीनों में चाय की जगह नींबू पानी या छाछ परोसी जा रही है।
दरअसल, पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष, खासकर ईरान और इज़रायल के बीच बढ़ते तनाव के कारण ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई है। खाड़ी क्षेत्र से गुजरने वाला महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का बड़ा केंद्र माना जाता है। इस क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही बाधित होने से गैस और तेल की आपूर्ति पर असर पड़ा है, जिसका सीधा प्रभाव भारत जैसे बड़े आयातक देश पर पड़ रहा है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी आयातक है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति में थोड़ी भी बाधा आने पर घरेलू बाजार में गैस की उपलब्धता प्रभावित होने लगती है। इस संकट का सबसे ज्यादा असर कमर्शियल रसोई गैस पर पड़ा है, जिसका इस्तेमाल रेस्टोरेंट, होटल, कैंटीन और हॉस्टल में होता है। देश के कई शहरों में होटल और रेस्टोरेंट गैस बचाने के लिए कम ईंधन में बनने वाले व्यंजन तैयार कर रहे हैं। चेन्नई, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहरों में डोसा और पूरी जैसे व्यंजन मेन्यू से हटाए जा रहे हैं। वहीं नई दिल्ली के कुछ ढाबों में बोर्ड लगाकर केवल सीमित भोजन उपलब्ध होने की सूचना दी जा रही है। गुजरात की एक ऑटोमोबाइल फैक्ट्री की कैंटीन में तली हुई चीजें बनाना बंद कर दिया गया है और चाय की जगह नींबू पानी परोसा जा रहा है। इसी तरह पुणे का मशहूर मॉडर्न कैफे गैस खत्म होने के कारण दो दिन तक बंद रहा।
इस गैस संकट का असर हॉस्पिटैलिटी और पर्यटन क्षेत्र पर भी पड़ने लगा है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और गोवा जैसे पर्यटन राज्यों में होटल मालिकों की चिंता बढ़ गई है। गैस की अनिश्चित आपूर्ति के कारण कई होटल एडवांस बुकिंग लेने से बच रहे हैं। पर्यटन सीजन के दौरान ऐसी स्थिति होटल उद्योग के लिए चुनौती बन सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि गैस संकट के कारण रेस्टोरेंट की उत्पादन क्षमता घट सकती है और इसका असर फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म्स पर भी पड़ सकता है। कुछ कारोबारी अब इलेक्ट्रिक ओवन, माइक्रोवेव और इंडक्शन जैसे विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं। संकट से निपटने के लिए कई संस्थान वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। आईआरसीटीसी ने रेलवे स्टेशनों पर कैटरिंग यूनिट्स को इंडक्शन और माइक्रोवेव इस्तेमाल करने के निर्देश दिए हैं। वहीं कुछ शहरों में ढाबों को अस्थायी रूप से कोयला और लकड़ी के चूल्हे इस्तेमाल करने की अनुमति भी दी जा रही है। बेंगलुरु की एम्पायर रेस्टोरेंट चेन ने बायोगैस प्लांट से मिलने वाले ईंधन का उपयोग शुरू किया है। इसके अलावा कई राज्यों में पाइप्ड गैस कनेक्शन और वैकल्पिक ईंधन की व्यवस्था पर भी विचार किया जा रहा है। फिलहाल स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। कई हॉस्टल और पीजी संचालकों के पास केवल चार-पांच दिन का गैस स्टॉक ही बचा है। ऐसे में जब तक अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति सामान्य नहीं होती, तब तक रेस्टोरेंट और कैंटीनों में सीमित मेन्यू के साथ ही काम चलाना पड़ सकता है।विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट इस बात का संकेत है कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में किसी भी बड़े भू-राजनीतिक तनाव का असर सीधे आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ सकता है। इसलिए भविष्य में ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भरता बढ़ाना जरूरी माना जा रहा है।