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गौरवांवित इतिहास:पोलैंड में भारत के इस राजा को भगवान का दर्जा क्यो मिला? पोलैंड की सड़कें ,चौक, स्कूल,योजनाएं आखिर क्यों हैं भारत के इस राजा के नाम पर?इस राजा के प्रति पोलैंड क्यों है कृतज्ञ? जानिए अपने भारत के इस इतिहास को

editor
  • Kanchan Verma
  • March 03, 2022 06:03 AM
Why did this king of India get the status of God in Poland? Why are Poland's roads, squares, schools, plans named after the Indian king? Know this truth from the pages of history

रूसी सेना के यूक्रेन पर आक्रमण करने के बाद यूक्रेन के नागरिक ही नही बल्कि वहाँ रह रहे विदेशी नागरिक भी अपनी जान बचाने के लिए दूसरे देशों में शरण ले रहे थे। इन विदेशी नागरिकों में भारतीय छात्र भी है जिन्हें पोलैंड की ओर से सराहनीय मदद उपलब्ध करवाई गयी। पोलैंड के बॉर्डर पर पोलैंड के नागरिकों,शासन और वहाँ रह रहे सिख समुदाय के लोगो द्वारा हर संभव कोशिश कर वहाँ पहुंच रहे भारतीयों की मदद की गयी। पोलैंड और भारत का आपस मे क्या रिश्ता है? आखिर क्यों पोलैंड भारतीयों के लिए जान छिड़कने को तैयार है?आखिर क्यों भारत के एक राजा के नाम पर पोलैंड में कई सड़के,कई योजनाएं और कई चौक समर्पित है?आइये चलते है इतिहास के पन्नो में


बात दूसरे विश्वयुद्ध की है जब 1939 में रूसी सेना और जर्मनी ने मिलकर पोलैंड पर कब्जा कर लिया था। जो हालात आज यूक्रेन में है ऐसे ही हालात दूसरे विश्वयुद्ध में पोलैंड भी देख चुका है। उस युद्ध मे पोलैंड के हज़ारो सैनिक मारे गए लोग बेघर हो गए,उनके बच्चे अनाथ हो गए महिलाएं अपनी इज्जत बचाने के लिए यहां वहां छुपने की जगह तलाशने लगीं। 1941 तक ये बेघर और अनाथ हुए लोग पोलैंड के शिविरों में छुपते रहे,लेकिन बर्बरता रुकी नही,रूसी सेना ने उन शिविरों से पोलैंड के इन लोगो को मार मार कर भगाना शुरू कर दिया। 600 से ज़्यादा बच्चे और 500 शरणार्थी महिलाओं से भरा जहाज ईरान के बंदरगाह पहुंचा लेकिन वहां उन्हें शरण की अनुमति नही मिली,इसके बाद जितने भी देश रास्ते मे आये किसी ने भी उन धक्का दिए हुए लोगो को शरण नही दी। अंत मे वो जहाज भटकते हुए भारत के गुजरात जामनगर के तट पर पहुंचा। कई दिनों के भूखे प्यासे बच्चे और महिलाएं दम तोड़ने जैसी हालत में थे। जामनगर के राजा दिग्विजयसिंह जाडेजा को जब पता चला तो उन्होंने तुरंत जहाज के सभी लोगो को अपने यहां शरण दी उस वक्त भारत खुद अंग्रेजों का गुलाम था,और अंग्रेज नही चाहते थे कि ये पोलैंड निवासी यहां भारत मे रहें।

राजा दिग्विजयसिंह ने अंग्रेजों से लड़कर इन बच्चों और महिलाओं को शरण दी। यहां राजा दिग्विजयसिंह ने महिलाओं को रहने के लिए घर मुहैय्या करवाये उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा और आर्मी ट्रेनिंग दिलवाई। इन सभी के लिए राजा दिग्विजयसिंह ने जामनगर से 25 किमी दूर बलाचडी गांव में हर व्यवस्था उपलब्ध करवाई। राजा दिग्विजयसिंह ने पोलैंड से जान बचाने भारत आई पोलैंड की नई पौध को सींच कर इस काबिल बनाया कि वो अपना छीना हुआ सब कुछ दोबारा वापस हासिल कर सके। एक पिता की तरह सहारा दिया प्यार दिया और अपने हक के लिए लड़ना सिखाया। उस वक्त ब्रिटिश वॉर कैबिनेट की बैठक हुई अंग्रेजों ने इन सभी को रखने पर आपत्ति जताई, लेकिन अकेले राजा दिग्विजयसिंह इन महिलाओं और बच्चों के लिए लड़े बैठक में केवल दिग्विजयसिंह ही इन के समर्थन में थे और उनकी दलीलों के आगे ब्रिटिश कैबिनेट को मंजूरी देनी पड़ी। इसके बाद पोलैंड से और जत्थे आये जिन्हें मिलाकर बच्चों की कुल संख्या 1000 तक हो गयी। राजा दिग्विजयसिंह ने बच्चों के सर पर हाथ रख उन्हें यकीन दिलाया कि वो सुरक्षित है और उनके सर पर पिता का साया है। पोलैंड से इन बच्चों के किये फुटबॉल कोच मंगवाया गया ताकि बच्चे अपने देश की जड़ो से जुड़े रहे। बच्चों के लिए दिग्विजयसिंह ने लाइब्रेरी बनवाई जिसमे पोलिश किताबे रखी गयी ताकि बच्चों को पोलैंड के बारे में जानकारी मिल सके। राजा दिग्विजयसिंह ने इन सभी शरणार्थियों के लिए पोलिश त्यौहारों की भी व्यवस्था सुनिश्चित करवाई और उनके हर त्यौहार को धूमधाम से मनाया जाने लगा। ये सभी खर्च राजा दिग्विजयसिंह ने उठाया उन्होंने एक फूटी कौड़ी भी पोलैंड से नही ली। 1945 में जब विश्वयुद्ध खत्म होने को हुआ तब पोलैंड को सोवियत यूनियन में मिला लिया गया। 1946 में पोलैंड की सरकार ने भारत मे रह रहे इन शरणार्थियों को वापस बुलाने के लिए राजा दिग्विजयसिंह से संर्पक किया। राजा दिग्विजयसिंह ने कहा कि ये सब आपकी ही अमानत है जब चाहे आप ले जा सकते है। शरणार्थियों के पोलैंड वापस पहुंचने पर पोलैंड सरकार भी हैरान थी कि उन्हें भारत मे इतनी अच्छी शिक्षा और ट्रेनिंग दी गयी। कई बच्चों ने पोलैंड में आर्मी जॉइन कर ली और देश की सेवा की।

43 वर्ष बाद पोलैंड सोवियत यूनियन से अलग हो गया। आज़ाद पोलैंड भारत के राजा दिग्विजयसिंह के एहसानों को नही भुला और आज़ाद पोलैंड की सरकार ने राजधानी वॉरसा के एक चौक का नाम दिग्विजयसिंह के नाम पर रख दिया। राजा दिग्विजयसिंह  के निधन के बाद भी उनके सम्मान में पोलैंड में कई सड़के कई पार्क बनाये गए। 2013 में राजधानी वॉरसा में एक और चौक राजा दिग्विजयसिंह के नाम पर "गुड महाराजा स्क्वायर" बनाया गया। इतना ही नही राजा दिग्विजयसिंह को पोलैंड के सबसे लोकप्रिय बेडनारस्का हाईस्कूल के मानद संरक्षक की उपाधि से भी नवाजा गया और पोलैंड ने राजा दिग्विजयसिंह को अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान कमांडर्स क्रॉस ऑफ द ऑर्डर ऑफ मेरिट से भी सम्मानित किया। राजा दिग्विजयसिंह की शरण मे जो बच्चे पढ़े लिखे थे उन्ही में से एक बच्चा बाद में पोलैंड का प्रधानमंत्री बना। अब हर साल पोलैंड के उन शरणार्थियों के वंशज भारत जामनगर आते है और अपने पूर्वजों को याद करते है। हर साल पोलैंड में राजा दिग्विजयसिंह के नाम पर पोलैंड अखबारों में जाम साहब के नाम से आर्टिकल पब्लिश होते है। पोलैंड में राजा दिग्विजयसिंह को भगवान का दर्जा दिया गया है। उनके लिए कोई भी किसी तरह का अपशब्द नही कह सकता अगर कोई राजा दिग्विजयसिंह की शान के खिलाफ एक लफ्ज भी निकाल दे तो उसे कठोर सजा मिलती है। 

 

एक नजर राजा दिग्विजयसिंह के जीवन पर- 

दिग्विजयसिंह एक यदुवंशी राजपूत थे उनका जन्म 18 सितंबर 1895 को सदोदर में प्रसिद्ध क्रिकेटर केएस रंजीतसिंहजी के भतीजे के रूप में हुआ था । उन्होंने राजकुमार कॉलेज , राजकोट , सौराष्ट्र में , फिर मालवर्न कॉलेज और यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में शिक्षा प्राप्त की । 1939 से अपने निधन तक, वह राजकुमार कॉलेज , राजकोट की गवर्निंग काउंसिल के सबसे लंबे समय तक अध्यक्ष रहे। 7 मार्च 1935 को सिरोही में, सर दिग्विजयसिंहजी ने महाराजकुमारी बाईजी राज कंचन कुंवरबा साहिबा (1910-1994) से शादी की, जो सिरोही के महाराजाधिराज महाराजा सर सरूप राम सिंह बहादुर की दूसरी बेटी थीं जिन्हें  उन्होंने महारानी देवरी महारानी गुलाब कुंवरबा साहिबा का नाम दिया और उनके एक बेटा और तीन बेटियां हुई। महाराजा दिग्विजयसिंह  का निधन 3 फरवरी 1966 को 70 वर्ष की आयु में बॉम्बे में हो गया। उनके इकलौते बेटे, शत्रुसल्या सिंह , जो सौराष्ट्र के लिए प्रथम श्रेणी के क्रिकेटर थे को उनका उत्तराधिकारी बनाया


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