पहाड़ पर 'मलबा' बनेगा मुसीबत? चमोली,उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ में 48 संवेदनशील स्थल चिह्नित; मुख्य सचिव ने दिए हाई अलर्ट के निर्देश
देहरादून। उत्तराखंड के सीमावर्ती जिले चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ में मलबे के बहाव का खतरा मंडरा रहा है। शासन ने इन तीनों जनपदों में कुल 48 ऐसे स्थानों की पहचान की है, जहाँ मलबे का बहाव जनजीवन और बुनियादी ढांचे के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने सचिवालय में हुई एक उच्च स्तरीय बैठक में इन क्षेत्रों की निरंतर निगरानी और त्वरित निवारक उपाय करने के कड़े निर्देश दिए हैं।
जांच में सामने आया है कि ये सभी 48 संवेदनशील स्थान मुख्य रूप से प्राकृतिक जल निकासी मार्गों के आसपास स्थित हैं। बरसात या भूस्खलन की स्थिति में इन रास्तों से भारी मात्रा में मलबा नीचे की बस्तियों या सड़कों की ओर आ सकता है। प्रशासन ने जोखिम की गंभीरता को देखते हुए इन क्षेत्रों को तीन श्रेणियों में बांटा है। मुख्य सचिव ने स्पष्ट किया कि प्राथमिकता के आधार पर सबसे पहले उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में सुरक्षा कार्य शुरू किए जाएंगे। इस समस्या से निपटने के लिए सरकार ने देश के पांच प्रमुख तकनीकी संस्थानों की एक संयुक्त समिति गठित की है। इसमें भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण , भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान, केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान, उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र और उत्तराखंड भूस्खलन न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र के विशेषज्ञ शामिल हैं। यह टीम आधुनिक सैटेलाइट डेटा और जमीनी सर्वेक्षण के जरिए मलबे की गति और संभावित खतरे का आकलन करेगी। मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने जिला प्रशासन और वैज्ञानिकों के बीच बेहतर तालमेल बिठाने पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि केवल पहचान करना काफी नहीं है, बल्कि मानसून और आपदा के समय से पहले इन स्थानों पर 'प्रिवेंटिव एक्शन' (निवारक कार्य) दिखने चाहिए। बैठक में आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन सहित वाडिया संस्थान के विशेषज्ञ भी मौजूद रहे। संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाले ग्रामीणों और यात्रियों को सलाह दी गई है कि वे प्रशासन द्वारा जारी होने वाली मौसम और भूस्खलन संबंधी सूचनाओं पर कड़ी नजर रखें।